गुजरात की पावन भूमि से उत्पन्न, मालवा-मेवाड़ में पल्लवित और सम्पूर्ण भारत में विस्तृत — चौबीसा ब्राह्मण समाज की गौरवशाली धरोहर का विस्तृत वर्णन।
चौबीसा ब्राह्मण भारत की प्राचीनतम और गौरवशाली ब्राह्मण परंपराओं में से एक हैं। इनकी उत्पत्ति गुजरात प्रांत के चांदोद और नांदोद नामक नगरों से हुई है। इसीलिए इस जाति को "नाँदारे चौबासा" तथा "चौबीसे गुजराती" भी कहा जाता है।
ये ब्राह्मण मूलतः द्रविड ब्राह्मणों की पाँच शाखाओं में से गुजर शाखा से संबंधित हैं। विन्ध्याचल के दक्षिण में बसने वाले द्रविड ब्राह्मणों की पाँच जातियाँ थीं:
नामकरण का रहस्य: "चौबीसा" नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस जाति में ठीक २४ गोत्र थे, २४ उपनाम थे, २४ ऋषियों के वंशज थे, और यहाँ तक कि भोजन बनाने के २४ नियम भी थे। गायत्री मंत्र के २४ अक्षरों से भी इनका विशेष संबंध माना जाता है।
मिश्र बंधुओं के अनुसार — प्रथम ब्राह्मण एक ही जाति के थे, फिर वे गौड और द्रविड — दो भागों में विभाजित हुए। गौड ब्राह्मण विन्ध्याचल के उत्तर में और द्रविड ब्राह्मण दक्षिण में निवास करते थे।
गुजर ब्राह्मणों का इतिहास: संवत् ९९० के लगभग यह जाति गुजरात में सुसंगठित थी। संवत् ८०३ में वनमाल ने भीलमाल के गुजरों की सहायता से अन्हिल्वाड राज्य स्थापित किया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि गुजर ब्राह्मणों और क्षत्रियों का उद्गम इन्हीं गुर्जरों से हुआ है।
संवत् ९७३ में इस राज्य का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। परंतु संवत् १९०८ में कश्मीर नरेश सुभटवर्मन ने गुजरात पर भारी आक्रमण करके इस राज्य को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।
अरबी मुसलमानों ने सिंध पर अधिकार जमाया जिसका प्रभाव गुजरात के गुजरों पर भी पड़ने लगा।
वनमाल ने भीलमाल के गुजरों की सहायता से अन्हिल्वाड राज्य स्थापित किया।
राष्ट्रकूट नरेश तीसरे गोविंद ने गुजर राज्य को नष्ट कर दिया।
चौबीसे ब्राह्मण गुजरात के चांदोद-नांदोद नगरों में सुसंगठित समाज के रूप में स्थापित थे।
सम्राट अलाउद्दीन ने मलिक नस्तरत को गुजरात विजय के लिए भेजा। अंतिम हिन्दू नरेश को पराजित किया गया।
मुस्लिम अधिकार के बाद अनेक चौबीसे ब्राह्मण मालवा, राजस्थान, बागड़ और मेवाड़ में चले आए।
मेवाड़ के महाराणा ने चौबीसे ब्राह्मणों को पुरोहित बनाया और उन्हें पाँव में सोने के कड़े पहनने का सम्मान दिया।
मालवा व गुजरात प्रांत के चौबीसे ब्राह्मणों का महासम्मेलन आयोजित हुआ।
सेलाने में "चोबीसा ब्राह्मण फंड" संस्था की स्थापना — जाति के बच्चों की शिक्षा के लिए।
जब मुसलमानी आक्रमणों के कारण गुजरात में निर्वाह कठिन हो गया, तब चौबीसे ब्राह्मण पूजा-पाठ, ज्योतिष, वैद्यक और पुराण-कथा वाचन करते हुए अन्य प्रांतों में जाकर बसने लगे।
इनका मूल नाम "चौबीसे गुजराती" इस बात का प्रमाण है कि इनकी उत्पत्ति गुजरात से है। यदि इनकी उत्पत्ति मेवाड़ में हुई होती तो इनका नाम "मेवाड़े" होता, परंतु इनका नाम आरंभ से ही "चौबीसे गुजराती" चला आता है।
चांदोद व नांदोद — मूल निवास स्थान। बड़ी सभा और छोटी सभा के दो समूह।
होल्कर राज्य सहित मालवा में सर्वाधिक संख्या — लगभग ३,६५० घर।
राजस्थान के मेवाड़ प्रांत में — सिसोदिया वंश के पुरोहित। लगभग १,००० घर।
बागड़ व हाड़ोती में भी चौबीसे ब्राह्मणों के परिवार बसे हैं। तीनों प्रांतों के जाति भाइयों में एक पंक्ति में बैठकर भोजन करने की परंपरा प्रचलित रही है।
मूल चौबीसे ब्राह्मण समाज से समय के साथ विभिन्न प्रांतों में बसने के कारण अनेक शाखाएँ विकसित हुईं। सभी शाखाओं में वही चौबीस गोत्र प्रचलित हैं।
मूल जाति — चांदोद-नांदोद निवासी। बड़ी सभा और छोटी सभा के दो समूह।
सर्वाधिक जनसंख्या। मालवा में पूजा-पाठ और ज्योतिष कार्य में प्रसिद्ध।
मेवाड़ नरेश के निमंत्रण पर यज्ञ हेतु आए और वहीं बस गए।
नाग वंश की रक्षा के लिए बसाए गए — भगवान शिव के आदेश से।
मेवाड़ प्रांत में बसे चौबीसे ब्राह्मणों की एक शाखा।
चौबीसे ब्राह्मणों से अलग हुए — इनकी जाति अब अलग मानी जाती है।
चौबीसे ब्राह्मणों का महाभारत काल से भी संबंध है। महर्षि जरत्कारू, जो विष्णुवृद्ध गोत्र के चौबीसे ब्राह्मण थे, उनके पुत्र आस्तिक मुनि का उल्लेख महाभारत में मिलता है।
राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पसत्र यज्ञ किया। इस यज्ञ में सभी नाग यज्ञकुंड में आहुति होने लगे। तब आस्तिक मुनि ने आकर राजा जनमेजय को मोहित किया और तक्षक तथा इंद्र को मुक्त कराया।
शिव का आदेश: भगवान शिव ने तक्षक (वासुकी) को आदेश दिया — "उस नगर में चोबीसे ब्राह्मणों का निवास कराओ — वे मेरे भक्त हैं, उनकी सेवा करो, उनके आशीर्वादों से तुम्हारा कल्याण होगा।"
शिव ने उस नगर के तीन नाम बताए: दानपुर (क्योंकि वहाँ ब्राह्मणों को दान मिला), नागर (क्योंकि नाग वंश वहाँ आए) और नागर (क्योंकि ब्राह्मण वैदिक मंत्रों से नागों की रक्षा करेंगे)।
इस प्रकार भट्टहरपुर के चौबीसे ब्राह्मणों में से आस्तिक मुनि का जन्म हुआ जिन्होंने नाग जाति की रक्षा की — यही चौबीसे ब्राह्मणों की पुराण-कालीन महिमा है।
जिस प्रकार गोत्र चौबीस हैं, उसी प्रकार इस जाति के उपनाम (अटक/अवेदक) भी परंपरागत रूप से चौबीस रहे हैं:
वेद, शास्त्र और ज्ञान का स्वयं पठन व दूसरों को शिक्षण
यज्ञ स्वयं करना और दूसरों से कराना — धर्म पालन
दान देना और सत्पात्र से दान ग्रहण करना
शम, दम, तप, शौच, क्षांति, आनव, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य
सूर्योदय पूर्व जागरण, संध्यावंदन, ब्रह्मचर्य पालन
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम का पालन
प्रकाशन काल (संवत् १९९२) में चौबीसे ब्राह्मणों की जनसंख्या का अनुमानित विवरण:
टिप्पणी: यह आँकड़ा लगभग संवत् १९९२ (सन् १९३५ ई०) के हैं। वर्तमान में चौबीसा समाज की जनसंख्या इससे कई गुना अधिक है और सम्पूर्ण भारत में फैली हुई है।
स्रोत: "चौबीसा ब्राह्मणों की उत्पत्ति — एक पुरानी धरोहर" | लेखक: हरिशंकर पाण्डेय विशारद, चचोर परगना रामपुरा, होल्कर स्टेट | प्रकाशक: पंडित मुकुन्दराम औंकारजी चौबीसे, नया बाजार धार | प्रकाशन: संवत् १९९२, आनन्द सागर स्टीम प्रेस, दरबार धार | यह सामग्री उक्त ऐतिहासिक ग्रंथ पर आधारित है और शैक्षणिक उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।