स्वास्तिक हिन्दू धर्म का सबसे पवित्र मांगलिक प्रतीक है। जानिए इसके ऐतिहासिक महत्व, चार भुजाओं के अर्थ, विश्वव्यापी प्रचलन और जीवन में इसके उपयोग की विस्तृत जानकारी।
स्वास्तिक हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण प्रतीक है, जो शांति और समृद्धि का द्योतक है।
कोई भी हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान इस प्रतीक के बिना पूरा नहीं होता।
इसका प्रयोग हमारी पृथ्वी की शुरूआत और सौर प्रणाली, पृथ्वी और अन्य ग्रहों के गठन तथा सूर्य के निशान का प्रकार है। सूर्य देव हमारे लिए सब कुछ हैं — वे अपना प्रकाश बन्द कर दें तो सब नष्ट हो जाए।
स्वास्तिक के चार हथियार और चार भुजाएं चार दिशाओं के लिये खड़े हैं — उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम। ये चार वेदों का भी प्रतीक हैं — ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद। साथ ही मानव जीवन के चार उद्देश्य: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तथा जीवन के चार आश्रम: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वनप्रस्थ और सन्यास के प्रतीक भी हैं।
भारतीय संस्कृति में महत्व
स्वास्तिक का भारतीय संस्कृति में बड़ा महत्व है। विघ्नहर्ता गणेश जी की उपासना, धन-वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ शुभ-लाभ और स्वास्तिक की पूजा का विधान है।
विभिन्न प्रकार के सुख और समृद्धि का प्रतीक स्वास्तिक घर-आंगन, द्वार आदि स्थानों पर शुभ व मांगलिक कार्य आरम्भ के समय बनाया जाता है। इसे सूर्य और विष्णु का प्रतीक माना जाता है।
सिद्धान्तसार के अनुसार इसे ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना जाता है। इसके मध्य भाग को विष्णु की नाभि, चारों को ब्रह्माण्डल के चार मुख — चार दिशाओं के चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है।
स्वास्तिक का अर्थ है — श्रेम मंगल अर्थात् शुभता और 'क' अर्थात् कारक या करने वाला। इसलिए देवताओं के तेज के रूप में शुभत्व देने वाला स्वास्तिक है।
विश्वव्यापी प्रचलन
स्वास्तिक का प्रचलन केवल भारत तक सीमित नहीं है। जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिश्र, ब्रिटेन, अमेरिका, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साईप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वास्तिक का प्रचलन रहा है।
- मोहन जोदड़ा व हड़प्पा संस्कृति अशोक के शिलालेखों में उल्लेख
- रामायण, हरवंश पुराण, महाभारत आदि में अनेक बार चर्चा
- चीन में इसे दीर्घायु और कल्याण का प्रतीक माना जाता है
- तिब्बत में लोग इसे अपने शरीर पर गुदवाते हैं
- जैन धर्म में अक्षत पूजा के समय स्वास्तिक चिन्ह बनाते हैं
- फारसी इसे चतुर्दिक दिशाओं और समय की चारों प्रार्थना का प्रतीक मानते हैं
हिन्दू संस्कारों में स्वास्तिक का प्रयोग
हिन्दू समाज में किसी शुभ संस्कार में स्वास्तिक का अलग-अलग तरीके से प्रयोग किया जाता है।
जब बच्चे की पहली बार मुण्डन संस्कार किया जाता है, तो भुजा के द्वारा हल्दी, रोली, मक्खन को मिलाकर स्वास्तिक बनाया जाता है। सिर के ऊपर स्वास्तिक बनाने का अर्थ है — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषार्थ योगमय रूप से सदा प्रभावी रहें।
स्वास्तिक के अन्दर चारों भागों में बिन्दु लगाने का मतलब है कि व्यक्ति का दिमाग केन्द्रित रहे। वृहद रूप में स्वास्तिक की भुजा का फैलाव सम्बंधित दिशा में सम्पूर्ण ऊर्जा को एकत्रित करता है।
स्वास्तिक — संस्कृत व्याकरण के अनुसार
स्वास्तिक संस्कृत भाषा का अव्यय पद है। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार इसे वैयाकरणों की सूची में 54वें क्रम के अव्यय पदों में गिना गया है। यह 'सु' उपसर्ग तथा 'अस्ति' अव्यय के संयोग से बना है।
स्वास्तिक अव्यय पद का कल्याण — 'मंगल', 'शुभ' आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है।
विभिन्न रंगों का स्वास्तिक
शरीर की सुरक्षा के साथ भौतिक सुरक्षा की प्रति भी उपयोगी
धर्म के मामलों और संस्कार के मामलों में प्रयोग
विशेष तांत्रिक प्रयोगों में उपयोग
ॐ और स्वास्तिक — एक साथ
स्वास्तिक भारतीयों में चाहे वैदिक हो या सनातनी, जैनों, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र — सभी मांगलिक कार्यों जैसे विवाह आदि संस्कार में घर के अन्दर कोई भी मांगलिक कार्य होने पर "ॐ" और स्वास्तिक का दोनों को अथवा एक-एक का प्रयोग किया जाता है।
"सुख, समृद्धि और रक्षित जीवन के लिए ही स्वास्तिक की पूजा का विधान है।"