अथर्ववेद के अनुसार ॐ (ओम) केवल एक शब्द नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड की शक्ति का स्रोत है। जानिए ॐ की उत्पत्ति, महिमा और उसके उच्चारण से मिलने वाली अद्भुत शक्ति के बारे में।
भद्रं श्लोक श्रृणुयासम!
(अथर्ववेद 16/2/4) — अर्थात् मैं सदा भला शब्द ही सुना करूँ।
एक बार दानवों ने इन्द्रपुरी को घेरकर सुसज्जित हथियारों से भारी संख्या की सेना के साथ देवता इन्द्र को युद्ध के लिये ललकारा। अचानक हुए हमले से महाप्रतापी इन्द्र ने पराजय हो जाने एवं इन्द्रपुरी के छीन जाने के डर से भगवान की शरण ली।
भगवान ने भी तुरन्त बिना देर किये सलाह दी कि केवल शब्द शक्ति के देवता 'ॐ' की सहायता से ही आप सब में नवप्राण और नवउत्साह संचार सम्भव है। वे ही मेरी शक्ति के स्रोत हैं। उनकी कृपा से मुर्दा दिलों में नयी शक्ति का प्रादुर्भव होता है। आप उन्हीं के पास जाईये और शब्द शक्ति ग्रहण कीजिये। भले शब्दों में भी प्रचण्ड शक्ति भरी हुई है। उसकी साधना कीजिये।
महाराज इन्द्र को धैर्य हुआ। 'ॐ' ओम देवता के पास जाकर दर्शन मात्र से अमित शान्ति एवं शक्ति का संचार हुआ। असुरों द्वारा किये हुए हमले की बात सुनाकर स्वर देवता 'ॐ' से सहायता करने की गुहार की।
'ॐ' देवता ने देवताओं पर आये हुए संकट के बारे सोचते हुए पाया कि देवताओं में वीरता, साहस, धैर्य, उत्साह एवं आत्मविश्वास की कमी थी। देवताओं पर दया कर शर्त के साथ सहायता करने के लिये तैयार हुए और बोले —
न माननिरिमत्वा ब्राह्मण ब्रह्म वदेयुर्यदि,
वदेयुर ब्रह्म तत् स्यादिति।।
(गोपद बा. 1/23)
अर्थात् मुझ (ओम) को पहले पढ़े बिना ब्राह्मण वेद का उच्चारण नहीं करें और यदि नाम के बिना ब्राह्मण वेद पाठ करें तो वह देवताओं द्वारा स्वीकार न किया जाये।
देवताओं ने इस शर्त का पालन करते हुये, विलम्ब किये बिना 'ॐ' देवता के नेतृत्व में ॐ...ॐ...ॐ... के जयघोष के साथ असुरों पर आक्रमण करके विजय हासिल की। 'ॐ' शब्द का उच्चारण चमत्कारी संजीवनी शक्ति के साथ जीवन और प्राणदायी है।
ॐ की अमरता और चमत्कार
तबसे 'ॐ' अमर हो गये। थके, हारे जीवन में निराश, उत्साहीन व्यक्तियों के जीवन में नवजीवन, नयी प्रेरणा, नयी स्फूर्ति, नयी शक्ति, नया विश्वास, नया साहस देने वाला अद्भुत चमत्कारी शब्द है।
'ॐ' ब्रह्मबीज है। विविध शक्तियों का आकाररूपी ब्रह्मा का संक्षिप्त रूप है। इसकी ध्वनि में ऐसे सूक्ष्म कम्पन होते हैं जो चारों ओर शक्ति और साहस का संचार करते हैं।
'ॐ' शब्द अ, उ, म अक्षरों के संयोग से बना है। इसमें भूत, भविष्य और वर्तमान — ओंकार का संक्षिप्त रूप है। इसकी चमत्कारी महिमा का वर्णन छान्दोग्योपनिषद में लिखा गया है।
ॐ का सार-क्रम
- सब भूतों का रससार — पृथ्वी
- पृथ्वी का रस — जल
- जल का सार — ओषधियाँ
- ओषधियों का सार — मानवदेह
- मानवदेह का सार — वाणी
- वाणी का सार — ऋचा (वेद)
- ऋचा का सार — सामवेद
- सामवेद का सार — ॐ
ओम की शक्ति अपार है। इसके उच्चारण से मनुष्य में शुद्ध और सात्विक भाव उत्पन्न होते हैं।
'ओम' शब्द में अनन्त दैवी शक्तियाँ भरी हुई हैं। 'ओम' में बल, बुद्धि, जीवन है। 'ओम' में इन्द्रियों का संयम है। सभी ऋषियों की सिद्धियाँ इसमें समाहित हैं।
गीता में ॐ की महिमा
भगवान श्री कृष्ण ने 'ओम' की महिमा का वर्णन करते हुये गीता के आठवें अध्याय में लिखा है —
ओमित्येकाक्षर ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।।
अर्थात् — जो आदमी मन और इंद्रियों को वश में कर "ओम" (ॐ) शब्द का जप करता है, वह ब्रह्म का स्मरण करता हुआ इस भौतिक देह को त्यागकर परमपद (मोक्ष) को प्राप्त करता है। इसके बाद जीवात्मा जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
"ॐ नम: शिवाय"