चौबीसा समाज

Choubisa Samaj

वागड़ क्षेत्र — इतिहास, संस्कृति और चौबीसा समाज का अटूट जुड़ाव

30 Apr 2026 1 मिनट पढ़ें लेख
वागड़ क्षेत्र — इतिहास, संस्कृति और चौबीसा समाज का अटूट जुड़ाव

वागड़ — राजस्थान का वह पवित्र क्षेत्र जो डूँगरपुर, बाँसवाड़ा और प्रतापगढ़ को समेटे हुए है। यहाँ की संस्कृति, इतिहास, लोक-परम्परा और चौबीसा ब्राह्मणों की भूमिका का विस्तृत विवरण।

वागड़ — यह नाम सुनते ही मन में उठती है माही नदी का कलकल प्रवाह, अरावली की हरी-भरी पहाड़ियाँ और सदियों पुरानी लोक-परम्पराओं की खुशबू। डूँगरपुर, बाँसवाड़ा और प्रतापगढ़ — राजस्थान के ये तीन जिले मिलकर एक अनूठे सांस्कृतिक क्षेत्र का निर्माण करते हैं जिसे वागड़ कहा जाता है। और इस वागड़ की आत्मा में बसते हैं चौबीसा ब्राह्मण — इस भूमि के असली संस्कारक, शिक्षक और पुरोहित।


🗺️ वागड़ का भौगोलिक परिचय

वागड़ क्षेत्र राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है। इसकी सीमाएँ गुजरात और मध्यप्रदेश दोनों से मिलती हैं।

  • डूँगरपुर जिला — वागड़ का हृदय। पहाड़ियों और झीलों से घिरा यह नगर "पहाड़ों की रानी" कहलाता है। यहाँ का गैब सागर झील और देव सोमनाथ मंदिर विश्वप्रसिद्ध हैं।
  • बाँसवाड़ा जिला — "सौ द्वीपों का शहर"। माही नदी के किनारे बसा यह जिला अपनी हरियाली और जनजातीय संस्कृति के लिए जाना जाता है।
  • प्रतापगढ़ जिला — वागड़ का उत्तरी प्रवेश द्वार। यहाँ के कागदी पिकअप झाला और सीतामाता अभयारण्य प्रसिद्ध हैं।

इस पूरे क्षेत्र में माही नदी जीवन-रेखा है। माही नदी अरावली की पहाड़ियों से निकलकर गुजरात में खम्भात की खाड़ी में मिलती है।


📜 वागड़ का गौरवशाली इतिहास

वागड़ का इतिहास पाँच हजार वर्ष से भी पुराना है। पुरातात्विक खुदाई में यहाँ से ताम्रपाषाण काल के अवशेष मिले हैं।

🏰 डूँगरपुर रियासत

डूँगरपुर रियासत की स्थापना १३वीं शताब्दी में हुई। महारावल वीरसिंह ने इस रियासत की नींव रखी। डूँगरपुर के महारावल रावल राजसिंह, उदयसिंह और पुंजराज इतिहास में विशेष स्थान रखते हैं।

इस रियासत में चौबीसा ब्राह्मण प्रमुख स्थान पर थे —

  • राजपुरोहित — राजा के धार्मिक अनुष्ठानों के संचालक
  • राजगुरु — राजा और राजपरिवार के आध्यात्मिक मार्गदर्शक
  • राजलेखक — राज्य के दस्तावेज और पत्र-व्यवहार के लेखक
  • ज्योतिषाचार्य — शुभ मुहूर्त और भविष्यवाणी के विशेषज्ञ

🏛️ बाँसवाड़ा रियासत

बाँसवाड़ा में महारावल जगमाल सिंह के समय में चौबीसा ब्राह्मणों को विशेष सम्मान मिला। वे यज्ञ-हवन, पुत्र-जन्म, राज्याभिषेक और विजय-प्रस्थान — सभी अवसरों पर अनिवार्य रूप से उपस्थित रहते थे।


🛕 वागड़ के प्रमुख तीर्थस्थल

🌊 बेणेश्वर धाम — वागड़ का प्रयाग

बेणेश्वर धाम माही, सोम और जाखम नदियों के संगम पर स्थित है। इसे "वागड़ का प्रयाग" कहते हैं। माघ पूर्णिमा पर यहाँ लाखों श्रद्धालु स्नान और दर्शन के लिए आते हैं। बेणेश्वर महादेव का मंदिर अत्यन्त प्राचीन है।

🕌 देव सोमनाथ — पत्थर की अद्भुत नक्काशी

देव सोमनाथ मंदिर डूँगरपुर से २४ किलोमीटर दूर स्थित है। यह मंदिर पत्थर की अद्वितीय नक्काशी के लिए विश्वप्रसिद्ध है। सोम नदी के किनारे बना यह मंदिर ११वीं शताब्दी में निर्मित है।

⚡ त्रिपुरा सुन्दरी — वागड़ की शक्तिपीठ

तलवाड़ा (बाँसवाड़ा) में स्थित त्रिपुरा सुन्दरी का मंदिर ५१ शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यह चौबीसा परिवारों की कुलदेवी हैं। नवरात्र में यहाँ विशेष अनुष्ठान होते हैं।

🌿 घोटिया अम्बा — पाण्डवों की तपस्थली

घोटिया अम्बा बाँसवाड़ा जिले में स्थित है। मान्यता है कि वनवास काल में पाण्डव यहाँ रुके थे। यहाँ प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा पर विशाल मेला लगता है।

🕍 गलियाकोट — साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रतीक

गलियाकोट में बोहरा मुस्लिम समुदाय की प्रसिद्ध दरगाह है। यहाँ हिन्दू और मुस्लिम दोनों श्रद्धा के साथ आते हैं — यह वागड़ की साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक है।


🎨 वागड़ की लोक-संस्कृति

🎭 लोक-नाट्य और नृत्य

  • गवरी नृत्य — भाद्रपद मास में भील जाति द्वारा ४० दिनों तक किया जाने वाला धार्मिक नाट्य
  • गैर नृत्य — होली के अवसर पर पुरुषों का सामूहिक नृत्य
  • भवाई — सिर पर मटके रखकर किया जाने वाला नृत्य
  • घूमर — महिलाओं का पारम्परिक नृत्य, विशेष पोशाक के साथ

🏺 शिल्पकला

  • काँच की जड़ाई — डूँगरपुर का पत्थर और काँच से बना फर्नीचर विश्वप्रसिद्ध है
  • जनजातीय आभूषण — चाँदी के अनूठे गहने
  • बाँस की बुनाई — टोकरी और कलाकृतियाँ

🎵 वागड़ी लोक-संगीत

वागड़ी भाषा राजस्थानी, गुजराती और भीली का अद्भुत मिश्रण है। यहाँ के लोक-गीतों में माही नदी, पहाड़ और प्रकृति का सुन्दर चित्रण होता है।


🌿 चौबीसा समाज और वागड़ का अटूट बन्धन

चौबीसा ब्राह्मण समाज का वागड़ से सम्बन्ध हजारों वर्ष पुराना है। इतिहासकारों के अनुसार चौबीसा ब्राह्मण मूलतः सरस्वती नदी के तट से आए थे। सरस्वती के विलुप्त होने के बाद वे क्रमशः दक्षिण की ओर बढ़ते हुए वागड़ क्षेत्र में बस गए।

वागड़ के २४ गाँवों में बसे होने के कारण ये "चौबीसा" कहलाए। इन गाँवों में उनके खेत, मंदिर, कुलदेवी के स्थान और पुरखों की समाधियाँ हैं।

  • पुरोहित की भूमिका — वागड़ के प्रत्येक गाँव में चौबीसा पुरोहित थे जो सभी संस्कार करवाते थे।
  • शिक्षा का प्रसार — गुरुकुल चलाकर वेद, संस्कृत और गणित की शिक्षा देते थे।
  • ज्योतिष — किसानों को कृषि के शुभ मुहूर्त और ऋतु-चक्र की जानकारी देते थे।
  • चिकित्सा — आयुर्वेद के ज्ञाता के रूप में ग्रामवासियों का उपचार करते थे।

🏙️ आधुनिक समय में वागड़

आज वागड़ तेजी से विकास कर रहा है। डूँगरपुर राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ा है। बाँसवाड़ा में माही बजाज सागर बाँध से हजारों एकड़ भूमि की सिंचाई होती है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

चौबीसा समाज के लोग आज IAS, IPS, चिकित्सक, इंजीनियर, वकील और उद्यमी के रूप में देश-विदेश में प्रतिष्ठित हैं। परन्तु उनकी जड़ें आज भी वागड़ की माटी में हैं।

वागड़ हमारी मातृभूमि है, हमारी संस्कृति की जननी है और हमारे पूर्वजों की तपोभूमि है। इस भूमि के प्रति कृतज्ञता हमारे DNA में है — और चाहे हम कहीं भी रहें, वागड़ हमेशा हमारे दिल में बसता है।

ॐ तत् सत् · जय परशुराम · जय चौबीसा समाज

स्रोत / Reference
चौबीसा अमृत परिचय पत्रिका - 2016 - 2017
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